Suman Krishnia
मृत्युभोज व हरिद्वार : व्यक्तिगत अनुभव
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पीहर में पिताजी ने मृत्युभोज 1982-83 (34 साल पहले) मे जब दादाजी गुजरे तब बंद कर दिया था, उस वक्त पिताजी की उम्र थी 48 वर्ष के करीब, यह उनका स्वयं का निर्णय था जो शायद उन्होंने मन में बहुत पहले ही ले रखा था, दादाजी के देहावसान पर क्रियांवित किया। परिवार के सदस्य भी सहमत। उसके बाद धीरे धीरे बाकि लोग भी बंद करते गए।
पीहर में पिताजी ने मृत्युभोज 1982-83 (34 साल पहले) मे जब दादाजी गुजरे तब बंद कर दिया था, उस वक्त पिताजी की उम्र थी 48 वर्ष के करीब, यह उनका स्वयं का निर्णय था जो शायद उन्होंने मन में बहुत पहले ही ले रखा था, दादाजी के देहावसान पर क्रियांवित किया। परिवार के सदस्य भी सहमत। उसके बाद धीरे धीरे बाकि लोग भी बंद करते गए।
ससुराल में दादा ससुर ने 1971 ( 47 साल पहले ) में अपनी मां के देहावसान के समय मृत्युभोज बंद करने का निर्णय लिया, उस वक्त दादा ससुर की उम्र 70 वर्ष के करीब थी, परिवार ने सहमति दी - उसके बाद धीरे धीरे आस पडो़स, गांव के लोगों ने भी बंद कर दिया। यह दादा ससुर का व्यक्तिगत निर्णय था, जिसमें परिवार नें सहयोग दिया।
इन दोनों ही स्थितियों में घर के बड़ो ने अपने घर से शुरूआत की व समाज के सामने एक उदाहरण पेश किया- बाकि लोग भी देर सवेर उसी राह पर चल पडे।