जाति की ज़ाहिल जकड़न
********************* प्रो. हनुमाना राम ईसराण
जाति है कि लाख जतन करने पर भी भारतीय समाज से जाती नहीं। व्यक्ति चाहे उच्चतम पद पर आसीन हो जाए, उसकी पहचान और ख़ास जगहों पर उसके प्रति सलूक उसकी जाति के हिसाब से ही होता है।
********************* प्रो. हनुमाना राम ईसराण
जाति है कि लाख जतन करने पर भी भारतीय समाज से जाती नहीं। व्यक्ति चाहे उच्चतम पद पर आसीन हो जाए, उसकी पहचान और ख़ास जगहों पर उसके प्रति सलूक उसकी जाति के हिसाब से ही होता है।
समाज को दिमागी रूप से गुलाम बनाने की साजिश के तहत जाति व्यवस्था ( Caste system ) का जटिल व कुटिल जंजाल रचा गया था। सदियों पुरानी व्यवस्था है यह। भारतीय समाज की एक अत्यंत उत्पीड़नकारी, शोषणकारी घृणित व्यवस्था।
जिस चीज ने भारतीय समाज को भीतर से संवेदनहीन, न्यायपूर्ण चेतना से रहित और अमानवीय बना दिया, वह है, जाति- व्यवस्था। जाति-व्यवस्था पर टिका समाज हमें रोज- ब- रोज अतार्किक, विवेकहीन, कायर, पाखण्डी और ढोंगी बनाता है तथा व्यक्ति के आत्मगौरव और मानवीय गरिमा को क्षरित करता है। जाति- व्यवस्था ने एक ऐसा श्रेणी-क्रम रचा, जिसमें हर जाति किसी दूसरी जाति की तुलना में नीच है। इसने श्रम न करने वाले परजीवियों को श्रेष्ठ तथा शारीरिक श्रम करने वालों को नीच तथा महानीच बना दिया। उत्पादन तथा सेवा करने वालों को शूद्र तथा अन्त्यज कह कर घृणा, उपेक्षा, अपमान, तिरस्कार का पात्र बना दिया गया, यहां तक कि उनमें से बड़े हिस्से को अछूत घोषित कर कर दिया गया। मनुष्य जाति के इतिहस में मानव को अछूत घोषित कने की शायद यह एक मात्र व्यवस्था है।
