"जिज्ञासु"का काव्य जगत
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Saturday, 17 June 2017
कविता: मजदूर
मैंने देखा है
उन
मजदूरों
को
जो पत्थर तोड़ते हैं
काली गहरी खदानों में
उनके कन्धों पर बडे़ बड़े घाव है
तेज नुकीले पत्थरों से
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